Papers On My Table

Fell in Love

“How you fell in love with him?”

He never flirted with me, neither did he try impressing with cheesy pick up lines or long paragraphs. He was just

“himself” whenever he spoke to me. He didn’t try to portray himself as a perfect individual. He made mistakes and errors and that’s what I loved about him. He didn’t try to hurry up things. True love doesn’t happen instantly. It takes time to understand your partner. We started communicating everyday, loved each other’s presence, hated the distance between us and that’s how slowly and slowly we fell for each other.

And, today till date, I fall for him a little more everyday because he’s someone I would never want to lose.💞

Life Partner Maturity

Maturity is not about talking 24/7 with your partner but understanding that everyone needs their personal space too. It’s not about exchanging gifts but marking little efforts daily for your beloved. Maturity is when both of you communicate the good as well as bad things rather than walking out of a fight angrily. It’s about being a support system for each other.

Maturity is about understanding that there is no l’ or “You’ in a relation but ‘We’ and ‘Us’.

It’s all about being a friend, a second parent, a teacher, a best friend and of course a partner

for life.

कोई बात नहीं है

तू हर्फ़ सा है मेरी जुबां पर
की तेरा लफ्ज जो तो है , पर तेरी कोई बात नहीं है

Friend

Yes I am blessed
With someone amazing such as you.
Friend for everything
friend to get me through

wish I could explain
what you mean to me.
worth more than anyone,
Without you I don’t know where I’d be

Just how truly special you are,
someone I could never replace
warmth of your all love & care
and it’s too hard to erase

Till the end.
I’ll treasure you
Nothing left to say except
I Love You

चीखों के पीछे सन्नाटे भाग रहे है

रात कह रही है सो जाओ अँधेरे जाग रहे है

चीखों के पीछे सन्नाटे भाग रहे है

तुम जगना नहीं किसी आवाज पर

गैर कर देना लगे कोई परिहास अगर

वो शर्म को बांधे नज़र में

ख़ामोशी त्याग रहे है

चीखों के पीछे सन्नाटे भाग रहे है

उसे इल्म है अपने आघात का

कौन उठाये बोझ विश्वास का

बीहड़ की ओट में छिपकर

दहलीज लिहाज की लांघ रहे है

चीखों के पीछे सन्नाटे भाग रहे है

आज एक अभीराम हूँ

में श्वेत से उठती चली अब रंग का आवास हूँ
में देह तपन न अविलास वाशी ,मुक्त मोह विश्वास हूँ

हूँ में मत अपना ही एक ,आवाम हूँ आगाज हूँ
में रचियता देह की ,में विमुख अंजाम हूँ

सति नहीं शंका नहीं ,संगर्ष पग पग परिणाम हूँ
पावक मृदु सी जलती नहीं, अब निर्लज आवाम हूँ

अहद उठ खड़ी बोल सी,चहक उठी ये गर्जना
थी कबि एक व्योम सी ,आज एक अभीराम हूँ

कौन करें 

बात यही है जानब की पहले बात कौन करें 
बातों से पहले की मुलाकात कौन करें 

वो जो गुजरे बिना उनके , और उनके इंतजार में 
उन तनहा चंद लम्हों का हिसाब कौन करें 

पर न होगा बिताने को कोई

याद नहीं कोई मुलाकात अपनी
याद नहीं कोई बात अपनी

याद है तो बस इतना की मिले थे चंद अफ़सानो के बीच
दोस्तों और कुछ बैगानो के बीच

मिले तो जाना अल्फाज एक जैसे ही थे
अल्हड थे हम ,तुम भी कुछ वैसे ही थे

न अल्फ हमको समझते थे ,न तारीफ़ तुमको याद थी
बेवजह को बातों में ही शायद हमारी बात थी

बैठ कर चर्चा करना भी याद था
बेवजह वक़्त क खर्चा भी याद था

अब बात होगी कहा ऐसी कोई
अब वक़्त होगा पर न बिताने को कोई

अब याद रह जायेंगे किस्से ,बातें और तुम
ढूंढे तुमको भी पुरानी बातों में हम

अब महफ़िल तो होगी पर बात न होगी  कोई
लोग हसेंगे पर साथ न हसेगा कोई

अब किस्से तो होंगे पर सुनने को न होगा कोई
अब वक़्त तो होगा पर न होगा बिताने को कोई 

रचनाकारजीत गया।

सुबह-सुबह,
जब सब शुरू कररहे थे…
अपने-अपने काम!!
वो भी उठा..औरलग गयाअपने काम में…वोभागने लगा…और,,तेज़ी सेभागता रहा!!कभी आँगनमें,
दौड़ती धूप के पीछे!!
कभी खिड़की पे फुदकती,
चिड़िया के पीछे!!
कभी, खेत में नाचती,
लहराती, सरसों को पकड़ने!!
कभी, गुनगुनाती,
बलखाती, नदी को जकड़ने!!
कभी,
गरजते, घुमड़ते बादल को थामने!!
या, इंद्रधनुष पर कोई डोरीबांधने!!
कभी,
क्षितिज की दूरी नापने! या,
अनगिन तारों की संख्या भाँपने!!
कभी,
चमकते, चढ़ते चाँद कोरोकने!! या,
जल्दी में चलती रातको टोकने!!
कभी, इतनी जल्द आ-जाने पर,
सूरज को डाँटने!
कभी,
सुबह उगी, ताज़ी-ताज़ीकिरणें, छाँटने!
या,
बिखरी रोशनी में अपना हिस्साबाँटने!!
वो भागता रहा, पर नाकामरहा!
हर कोशिश का हार हीअंजाम रहा!!
सफ़लता, जब उसके हाथन आई,
दुखी हो, इस छलावेसे,
उसने ये तरकीब लगाई,
योजना बनाई!!
लेने इस पराजय काप्रतिशोध,
कलम उठाई,
कागज़ पर शब्दों की, सेना बनाई!!
और इन ख़यालों परकर दी चढ़ाई!!
छंद, बंध के व्यूहमें आख़िर,
ये ख़्याल उलझ गए।
जाल में कविता केआख़िर, फँस गए,
सदा-सदा के लिए, डायरी में बस गए।
इस तरह, उदासी कावो पल बीत गया,
कल्पना हार गई ,रचनाकारजीत गया।

– अंशुल तिवारी

रात भर न सोया

बंद दरवाजें , खिड़कियों के पीछे वो रात भर रोया
चीखता रहा घुटन में पर रात भर न सोया

अरे कोई है क्या मेरे साथ भी कोई रख दे मेरे सर पे हाथ भी
कोई तो सुन ले मेरी खामोश सी चीखों को
कोई तो समझे  मैंने कितना है  खोया

अरे अकेला हूँ इन दीवारों के बीच
किसको गले लगयूं किसको लूँ बाँहों  में भींच

किसको बताऊँ की क्या क्या बीत रही है मुझ पर
में पला वहां काटों में ,जहा मैंने फूलों को बोया

वो चीखता रहा घुटन में रात भर न सोया

क्या पता तुम मिलो न मिलो , कुछ नए आयाम नज़र आ जाये
इन पुरानी दीवारों के पीछे कुछ नए मकान नज़र आ जाये

मैं  भूल जाऊं भी कितना मेरे बीते कल की यादें’
में चलु नयी मंज़िल पर और पुराना सामान नज़र आ जाये

भूलकर सो जायूँ जो तेरे साथ बीती रात को
में जागु सवेरा लेकर और शाम नज़र आ जाये

कभी टटोलूं कुछ  पुराने पन्ने जो यादों के कभी
और किसी कागज में तुम्हारा पैगाम नज़र आ जाएं

में लिखूं नज़राने हर पल तेरे नाम के
की हर लफ्ज में तेरी इबादत और ईमान नज़र आ जाएं

याद रखना मुझे

पुरानी कहानी, किस्से , बातें या हो बीती झिड़कियां
तन्हां गुजारिश के मंजर सा आँखों में याद रखना मुझे

किस्से दोहराना मेरे नामं के कभी
दिल की गर्दिशों में आबाद रखना मुझे

अल्फ मेरे नामं का जो आये कभी जुबां पर तुम्हारी
दफ़न यादों की सिया की एक फरियाद रखना मुझे

रखना नहीं शिकवे, शिकन या कोई शिकायतें
मरहूम ख्वाब के मंजरों सा आजाद रखना मुझे

कभी ज़िंदगी ने माँगा इतना

कभी ज़िंदगी ने माँगा इतना
की सब कुछ लुटा दिया

कभी याद आये इतना
की खुद को भुला दिया

कभी की उनसे शिकायत
कभी वो हमसे रूठ गए

कभी मनाया इस कदर
की खुदा बना दिया 

में फिर मिलूंगी

तुम्हारे आँखों की नमी बनकर
तुम्हरें अंश्कों की तस्वीर बनकर
में फिर मिलूंगी

 तुम्हरें बाजुओं की दस्तरस में
तुम्हारे खुदा से अपील बनकर
में फिर मिलूंगी

तेरी वफ़ा की रजा से
तेरे ग़मों में हबीब बनकर
में फिर मिलूंगी

कभी हया की बून्द से
तुम्हारें दर्द में करीब बनकर
में फिर मिलूंगी

ख्वाबों के चिराग से
तेरी आफताब की रात बनकर
में फिर मिलूंगी

तेरे ही जुर्म में
तेरे ही करम बनकर
में फिर मिलूंगी

चाहो छोड़ जाओ हाथ मेरा
तेरे रक़ीब की लकीर बनकर
में फिर मिलूंगी

दिल करता हैं

मुझे रंजिश भी नहीं किसी लफ्ज या अल्फाज से
ना जाने क्यूँ हर लफ्ज पर तेरा नाम लिखने का दिल करता है

यूँ तो जिक्र नहीं करती तेरा किसी आदम या ईमान से
पर  ” वो मेरा है ” इस बात पर गुमान करने  को दिल करता है

मुझे प्यार नहीं हुआ कभी तुमसे
न जाने क्यूँ तुम पर मिट जाने को दिल करता है

कभी लगा नहीं दीदार हो तुम्हारा हर रोज
पर हर दुआ में तुम्हे फरमाने को दिल करता हैं

कभी बेसुध धड़कनो ने लिए नहीं नाम तुम्हारा
पर तेरे खातिर सांसें थम लेने को दिल करता हैं

ऐसा भी नहीं की तेरे बिना तनहा सा लगता है कोई मंजर,
पर हर महफ़िल में तेरा साथ पाने का दिल करता हैं

की मुझे मालूम नहीं कोई आलम मेकशी का
पर तेरी बाँहों में झूम जाने को दिल करता है

की कोई रोको या सम्भालों मुझे इस दौर में ‘
मुझे तेरे हर एहसास में मिटने को दिल करता है

यूँ तो खुदा से भी  कोई सांझा या बेर भी नहीं
पर तुझे इस  रूह का खुदा बनाने को दिल करता है

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