रात भर न सोया

बंद दरवाजें , खिड़कियों के पीछे वो रात भर रोया
चीखता रहा घुटन में पर रात भर न सोया

अरे कोई है क्या मेरे साथ भी कोई रख दे मेरे सर पे हाथ भी
कोई तो सुन ले मेरी खामोश सी चीखों को
कोई तो समझे  मैंने कितना है  खोया

अरे अकेला हूँ इन दीवारों के बीच
किसको गले लगयूं किसको लूँ बाँहों  में भींच

किसको बताऊँ की क्या क्या बीत रही है मुझ पर
में पला वहां काटों में ,जहा मैंने फूलों को बोया

वो चीखता रहा घुटन में रात भर न सोया

क्या पता तुम मिलो न मिलो , कुछ नए आयाम नज़र आ जाये
इन पुरानी दीवारों के पीछे कुछ नए मकान नज़र आ जाये

मैं  भूल जाऊं भी कितना मेरे बीते कल की यादें’
में चलु नयी मंज़िल पर और पुराना सामान नज़र आ जाये

भूलकर सो जायूँ जो तेरे साथ बीती रात को
में जागु सवेरा लेकर और शाम नज़र आ जाये

कभी टटोलूं कुछ  पुराने पन्ने जो यादों के कभी
और किसी कागज में तुम्हारा पैगाम नज़र आ जाएं

में लिखूं नज़राने हर पल तेरे नाम के
की हर लफ्ज में तेरी इबादत और ईमान नज़र आ जाएं

साक्षीपुणे

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