पर न होगा बिताने को कोई

याद नहीं कोई मुलाकात अपनी
याद नहीं कोई बात अपनी

याद है तो बस इतना की मिले थे चंद अफ़सानो के बीच
दोस्तों और कुछ बैगानो के बीच

मिले तो जाना अल्फाज एक जैसे ही थे
अल्हड थे हम ,तुम भी कुछ वैसे ही थे

न अल्फ हमको समझते थे ,न तारीफ़ तुमको याद थी
बेवजह को बातों में ही शायद हमारी बात थी

बैठ कर चर्चा करना भी याद था
बेवजह वक़्त क खर्चा भी याद था

अब बात होगी कहा ऐसी कोई
अब वक़्त होगा पर न बिताने को कोई

अब याद रह जायेंगे किस्से ,बातें और तुम
ढूंढे तुमको भी पुरानी बातों में हम

अब महफ़िल तो होगी पर बात न होगी  कोई
लोग हसेंगे पर साथ न हसेगा कोई

अब किस्से तो होंगे पर सुनने को न होगा कोई
अब वक़्त तो होगा पर न होगा बिताने को कोई 

साक्षीपुणे

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