चीखों के पीछे सन्नाटे भाग रहे है

रात कह रही है सो जाओ अँधेरे जाग रहे है

चीखों के पीछे सन्नाटे भाग रहे है

तुम जगना नहीं किसी आवाज पर

गैर कर देना लगे कोई परिहास अगर

वो शर्म को बांधे नज़र में

ख़ामोशी त्याग रहे है

चीखों के पीछे सन्नाटे भाग रहे है

उसे इल्म है अपने आघात का

कौन उठाये बोझ विश्वास का

बीहड़ की ओट में छिपकर

दहलीज लिहाज की लांघ रहे है

चीखों के पीछे सन्नाटे भाग रहे है

साक्षीपुणे

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