रचनाकारजीत गया।

सुबह-सुबह,
जब सब शुरू कररहे थे…
अपने-अपने काम!!
वो भी उठा..औरलग गयाअपने काम में…वोभागने लगा…और,,तेज़ी सेभागता रहा!!कभी आँगनमें,
दौड़ती धूप के पीछे!!
कभी खिड़की पे फुदकती,
चिड़िया के पीछे!!
कभी, खेत में नाचती,
लहराती, सरसों को पकड़ने!!
कभी, गुनगुनाती,
बलखाती, नदी को जकड़ने!!
कभी,
गरजते, घुमड़ते बादल को थामने!!
या, इंद्रधनुष पर कोई डोरीबांधने!!
कभी,
क्षितिज की दूरी नापने! या,
अनगिन तारों की संख्या भाँपने!!
कभी,
चमकते, चढ़ते चाँद कोरोकने!! या,
जल्दी में चलती रातको टोकने!!
कभी, इतनी जल्द आ-जाने पर,
सूरज को डाँटने!
कभी,
सुबह उगी, ताज़ी-ताज़ीकिरणें, छाँटने!
या,
बिखरी रोशनी में अपना हिस्साबाँटने!!
वो भागता रहा, पर नाकामरहा!
हर कोशिश का हार हीअंजाम रहा!!
सफ़लता, जब उसके हाथन आई,
दुखी हो, इस छलावेसे,
उसने ये तरकीब लगाई,
योजना बनाई!!
लेने इस पराजय काप्रतिशोध,
कलम उठाई,
कागज़ पर शब्दों की, सेना बनाई!!
और इन ख़यालों परकर दी चढ़ाई!!
छंद, बंध के व्यूहमें आख़िर,
ये ख़्याल उलझ गए।
जाल में कविता केआख़िर, फँस गए,
सदा-सदा के लिए, डायरी में बस गए।
इस तरह, उदासी कावो पल बीत गया,
कल्पना हार गई ,रचनाकारजीत गया।

– अंशुल तिवारी-इंदौर

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