आज एक अभीराम हूँ

में श्वेत से उठती चली अब रंग का आवास हूँ
में देह तपन न अविलास वाशी ,मुक्त मोह विश्वास हूँ

हूँ में मत अपना ही एक ,आवाम हूँ आगाज हूँ
में रचियता देह की ,में विमुख अंजाम हूँ

सति नहीं शंका नहीं ,संगर्ष पग पग परिणाम हूँ
पावक मृदु सी जलती नहीं, अब निर्लज आवाम हूँ

अहद उठ खड़ी बोल सी,चहक उठी ये गर्जना
थी कबि एक व्योम सी ,आज एक अभीराम हूँ

-साक्षी –पुणे

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